महफूज़

ज़िन्दगी के झमेलों में,
9 से 5 के खेलों में,
आवाज़ महफूज़ है ख़ामोशी में |
ख़ुशी जहाँ बंद है किश्तों में,
रोज़ बनते बिगड़ते रिश्तों में,
मोहब्बत महफूज़ है तन्हाई में |
करारे नोटों की चमक में,
बड़े नामों की दमक में,
ज़िन्दगी महफूज़ है अंधेरों में |

पुलकित

होंसला बुलंद

चोटें खाई, गिरे भी
पर फिर उठ खड़े हुए
क्यूंकि हार तो हमने भी नहीं मानी थी …

लक्ष्य हासिल करना बाकी था, काफी दूर था
पर हम चलते चले गए
क्यूंकि हार तो हमने भी नहीं मानी थी …

चलते चलते राहें भूल गए
पर रास्ता बनाना सीख लिया
क्यूंकि हार तो हमने भी नहीं मानी थी …

नाम -ओ -निशान मिटने को था
पर पत्थर पे लकीर बना ली थी
क्यूंकि हार तो हमने भी नहीं मानी थी …

खेल भी उनका खिलाड़ी भी उनके
पर उन्ही को मात देदी
क्यूंकि हार तो हमने भी नहीं मानी थी …

ज़माने ने झुकने को कहा
पर हमने उन्ही का सलाम लिया
क्यूंकि हार तो हमने भी नहीं मानी थी …

जीना भी बेईमानी बन गया था
पर क्या करते हार तो हमने भी कहाँ मानी थी …

आज की आज़ादी

लहलहाती  ज़मीन  से  जब  सोंधी  महक  आती  है

यह  जवानी  देश  पे  मर  मिट  जाने  को  कह  जाती  है

शूरवीर  तोह  देश  पे  सर्वस्व्य  लुटाते  है

योधा  हम  भी  हैं   घर  बैठे  शब्दों  के  तीर  चलाते  है

खून  खौल  उठता  है  आतंक  के  उन  निशानों  पर

लेकिन  रक्त  की  कीमत  हमने  तोह  मौम  से  तोली  है

जब  अत्याचार  के  आगे  आदमी  शांत  बैठ  जाता  है

आदमी  वह  आदमी  नहीं  कहलाता  है

लोग  तोह  वो  जो  नए  आयामों  को  छुते  है

आसमानों  को  चीरते  भारत  की  विजयी  गाथा  गाते  है

और  हम  संकीर्णता  में  क़ैद  आज़ादी  का  जश्न  मनाते  है

प्रतापी  पुरुष  वह  निर्भयता  समाये  जिसमे  है

वसुधा  भी  वीरों  के  बलिदान  पर  रोती  है

कहने  में  तोह  क्या  आज़ादी  की  भी  कोई  कीमत  होती  है

ऐ  माँ  तेरी  यह  दशा  देख  दिल  आज  रोता  है

ऐसी  भी  क्या  लाचारी  की  हमसे  कुछ  भी  नहीं  होता  है

आदर्शों  को  महापुरुषों  ने  साध  लिया

फिर  क्यों  आज  सिर्फ  अराजकता  ने  दिल  में  राज  किया

कहाँ  गया  स्वर्णिम  भारत  का  वह  हर्दय विशाल

खुद  ही  तोह  हमने  चहु  ओर  बुन  लिया  मायाजाल

सपूतों  ने  है  माँ  का  नाम  किया

कर्मठ  ने  भी  क्या  कभी  आराम  किया

आज  के  हिन्दुस्तानी  को  मेहनतकश बाजू  शोभा  नहीं  देते

करमशीलता  पर  क्यों   इतनी  शंका  है

राम  राज्य  में   रावन  का  डंका  है

जलाये  से  न  जले  ऐसी  यह  लंका  है

मातृभूमि  की  पीड़ा  अनेक  है

पर  उसके  लिए  लड़ने  वाले  सैनिक  बस  कुछ  एक  है

बार  बार  अच्छाई   आज  संहार  किया

उस  जननी  को  सिर्फ  और  सिर्फ  शर्मसार  किया

अरे  अब  तोह  सुधरें, अब  तो  बदले

वक़्त  आ  गया  है  जागने  का , बहुत  कुछ  त्यागने  का

मैंने  भी  स्वर्णिम  भारत  का  सपना  फिर  संजोया  है

सुन्हेरे  कल  को  अपने  हाथो  से  पिरोया  है